शारीरिक कठिनाइयां हमेशा समता सिखाने के पाठ के रूप में आती हैं और यह प्रकट करती हैं कि हमारे अन्दर इतने पर्याप्त रूप में क्या शुभ और प्रकाशमय है जिस पर इन चीजों का कोई असर न पड़े। हम समता में ही उपचार पाते हैं ।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि समता का अर्थ उदासी न होना चाहिये।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…