दो तरह के वातावरण

आश्रम में दो तरह के वातावरण हैं, हमारा तथा साधकों का। जब ऐसे व्यक्ति जिनमें अनुभूति पाने की कुछ क्षमता हो, बाहर से यहाँ आते हैं तब वे यहाँ के वातावरण की गभीर अचञ्चलता तथा शान्ति का अनुभव पाकर भौचक्के रह जाते हैं, बाद में जब साधकों से उनका मेल-जोल हो जाता है तब बहुत बार उनकी धारणा और वह प्रभाव धुंधला-सा पड़ जाता है, क्योंकि बहुधा साधकों के वातावरण की उदासी या चञ्चलता के वे शिकार हो जाते हैं। हाँ, अगर वे श्रीमाँ के प्रति उद्घाटित रहें-जैसा कि
उन्हें होना चाहिये-तब वे उसी अचञ्चलता तथा शान्ति में रहेंगे, उदासी या चञ्चलता उन्हें छू तक न पायेगी।

संदर्भ : श्रीअरविंद अपने विषय में 

शेयर कीजिये

नए आलेख

सावधानी

अगर तुम जीवन में एक भूल करो तो हो सकता है कि तुम्हें सारे जीवन…

% दिन पहले

समुचित मार्ग

(अधिकतर साधक) अहंकारी होते हैं और वे अपने अहंभाव को अनुभव या स्वीकार नहीं करते।…

% दिन पहले

अवतार की सम्भावना

अवतार की सम्भावना पर विश्वास करने या न करने से प्रकट तथ्य पर कोई फ़र्क़…

% दिन पहले

ध्यान कहाँ ?

मधुर माँ,  यहाँ अपने कमरे में बैठ कर ध्यान करने और सबके साथ खेल के…

% दिन पहले

कुछ भी असंभव नहीं

यदि चैत्य पुरुष की प्रकृति जाग्रत हो जाए, अपने पीछे विद्यमान माताजी की चेतना और…

% दिन पहले

रूपान्तर की अवस्थाएँ

भागवत चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। रूपांतर की भी विभिन्न अवस्थाएँ होती है। पहली…

% दिन पहले