“श्रद्धा के साथ जो कोई भक्त मेरे जिस किसी रूप को पूजना चाहता है, मैं उसकी वही श्रद्धा उसमें अचल-अटल बना देता हूँ। ” वह अपने मत और उपासना की उस श्रद्धा के बल पर अपनी इच्छा पूर्ण करा लेता और आध्यात्मिक उपलब्धि को प्राप्त कर लेता है जिसका वह उस समय अधिकारी होता है।
संदर्भ : गीता-प्रबंध
जब तुम अधीर हो उठो और अपने-आपसे कहो : "आह, मुझे यह करने में सफल…
श्रद्धा, भगवान् के ऊपर निर्भरता, भागवत शक्ति के प्रति आत्म-समर्पण और आत्मदान-ये सब आवश्यक और…
तुम्हें चीजों को उसी तरह बढ़ने देना चाहिये जैसे प्रकृति में पौधे बढ़ते हैं। हम…
समस्त धन-सम्पदा भगवान् की है, भगवान् उसे जीवित प्राणियों को उधार देते है और स्वभावत:…
सत्ता के पूर्ण आध्यात्मिक जीवन के लिये तैयार हों जाने से पहले सांसारिक जीवन का…