जब हम मानसिक प्रवुत्तियों में अथवा बुद्धि के व्यापारों में एकाग्र रहते हैं, तब कभी-कभी भगवान को क्यों भूल जाते अथवा उनका स्पर्श क्यों गवां बैठते है ?
तुम इसलिए गवां बैठते हो क्योंकि तुम्हारी चेतना अभी तक बंटी हुई है । तुम्हारें मन में भगवान अभी तक अच्छी तरह बसे नहीं है ; अभी तक तुम दिव्य जीवन पर पूर्ण रूप से न्योछावर नहीं हुए हो । नहीं तो इस प्रकार के कामों में तुम चाहे जितने लीन क्यों न रहो, फिर भी तुम्हे यह भान रहेगा कि भगवान तुम्हारी सहायता कर रहे हैं और तुम्हें सहारा दिये हुए है ।
संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९२९-१९३१
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…