भारत का मिशन या जीवन-लक्ष्य है मानवता को मानव-स्वातन्त्र्य, मानव-समानता, मानव-भ्रातृत्व के सच्चे उद्गम की ओर पुनः निर्देशित करना। जब मनुष्य आत्मा में स्वतन्त्र होता है, तब अन्य समस्त स्वतन्त्रता उसके वश में हो जाती है। क्योंकि प्रभु स्वतन्त्र हैं, उन्हें बांधा नहीं जा सकता। जब मनुष्य भ्रान्ति से मुक्त कर दिया जाता है, तब वह विश्व की दिव्य समानता को अनुभव करता है जो स्वयं को प्रेम और न्याय के माध्यम से परिपूरित करती है और यह बोध स्वयं को सरकार तथा समाज के विधान में उंडेलता है। जब वह इस दिव्य समानता को अनुभव कर लेता है तब वह सम्पूर्ण विश्व का भाई बन जाता है और वह जिस अवस्था में भी रहता है, वह सभी मनुष्यों की सेवा अपने भाइयों के समान प्रेम और न्याय के विधान के द्वारा करता है। जब यह बोध धर्म का, दर्शनशास्त्र का, सामाजिक चिन्तन तथा राजनीतिक अभीप्सा का आधार बन जाता है, तब स्वतन्त्रता, समानता तथा भ्रातृत्व समाज के संगठन में अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लेते हैं और तब सत्ययुग लौट आता है। लोकतन्त्र की यह एशियाई व्याख्या है।… आत्मा में स्वतन्त्र रहना प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है। सेवा के प्रति वह बाध्य हो, पर मजबूरी से नहीं बल्कि प्रेम द्वारा उसे समाज में समाज की सेवा करने की क्षमता के अनुसार, न कि दूसरों के निहित स्वार्थ के अनुसार, उचित स्थान मिले, किन्तु आत्मा में वह सबके समान हो। वह अपने भाई-बन्धुओं के साथ परस्पर प्रेम और सेवाभाव के द्वारा सामञ्जस्यपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करे, न कि दासता की बेड़ियों के द्वारा या शोषित और शोषक, भक्ष्य और भक्षक के सम्बन्धों के द्वारा। कहा जाता है कि लोकतन्त्र मानवाधिकारों पर आधारित है। इसका उत्तर दिया। जाता है कि इसे तो बल्कि मनुष्य के कर्तव्यों पर आधारित होना चाहिये।

किन्तु अधिकार और कर्तव्य दोनों यूरोपीय विचार हैं। धर्म भारतीय धारणा है जिसमें अधिकार और कर्तव्य का वह कृत्रिम प्रतिरोध लुप्त हो जाता है। जो स्वार्थजनित कर्म से उत्पन्न होता है, और उनमें एक गहरी और सनातन एकता पुनः स्थापित हो जाती है…

 

संदर्भ : श्रीअरविंद (खण्ड-१)

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