जीवन का सबसे अधिक विलक्षण अनुभव यह है कि जब वह दुख क्लेश के रूप और उससे होने वाली आशंका की परवाह करना छोड़ देता है तो वह देखता है कि उसके इर्द-गिर्द कहीं दु:ख-क्लेश का नामोनिशान तक नहीं हैं। उसके बाद ही हम उन झूठे बादलों के पीछे भगवान को अपने ऊपर हँसते हुए सुनते हैं।
संदर्भ : विचार और सूत्र के प्रसंग में
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…