विश्व की अंतिम सीमा तक ... बल्कि उसके भी परे तक अपना विस्तार करो। प्रगति की समस्त आवश्यकताओं को हमेशा…
हर एक पहले अपने लिए जिम्मेदार है ; और अगर तुम औरों की सहायता करने की अभीप्सा रखते हो तो…
भागवत कृपा हमेशा रहती है, शाश्वत रूप से उपस्थित और सक्रिय; लेकिन श्रीअरविंद कहते हैं कि हमारे लिए उसे ग्रहण…
ठीक उस समय जब हर चीज़ बद-से-बदतर होती हुई मालूम होती है, उसी समय हमें श्रद्धा का परम कर्म करना…
तुम्हें हमेशा पूरी-पूरी सहायता दी जाती है, लेकिन तुम्हें उसे अपने बाहरी साधनों द्वारा नहीं बल्कि अपने हृदय की नीरवता…
'भागवत कृपा' कार्य करने के लिए हमेशा मौजूद है लेकिन तुम्हें उसे कार्य करने देना चाहिये, उसकी क्रिया का प्रतिरोध…
'भागवत कृपा' के सामने कौन योग्य है और कौन अयोग्य ? सभी तो उसी एक दिव्य 'मां' के बालक…
साधक को हमेशा यह याद रखना चाहिये कि प्रत्येक वस्तु आन्तरिक मनोवृत्ति पर निर्भर करती है; यदि उसे भागवत कृपा…
किसी भी तरह के हतोत्साह को अपने ऊपर हावी मत होने दो और 'भागवत कृपा' पर कभी अविश्वास न करो।…
प्यारी माताजी, मुझे सर्दी हो गयी है, क्या मैं रोज़ की तरह स्नान करूँ ? जो तुम्हें पसंद हो करो,…