’भागवत कृपा’ के सामने कौन योग्य है और कौन अयोग्य ?
सभी तो उसी एक दिव्य ‘मां’ के बालक हैं ।
‘उनका’ प्रेम उन सब पर समान रूप से फैला हुआ है ।
लेकिन ‘वे’ हर एक को उसकी प्रकृति और ग्रहणशीलता के अनुसार देती हैं ।
सन्दर्भ : माताजी के वचन (भाग – २)
जीवनयात्रा में समस्त भय, संकट और विपदा का सामना करने के लिए कवच के रूप…
अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो ।…
सारी समस्या का निचोड़ यह है : बुद्धि के मानसिक प्रशासन की जगह आध्यात्मिक चेतना…