ठीक उस समय जब हर चीज़ बद-से-बदतर होती हुई मालूम होती है, उसी समय हमें श्रद्धा का परम कर्म करना चाहिये और यह जानना चाहिये कि भागवत कृपा हमें कभी निराश नहीं करेंगी ।
(रेखांकित शब्दों की व्याख्या)
मेरा मतलब है , परिणामों की परवाह किये बिना अपने आंतरिक विश्वास के साथ काम करना और बाहरी तौर पर उल्टे प्रमाणों के होते हुए भी अपनी श्रद्धा को अडिग रखना।
संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१७)
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…