ठीक उस समय जब हर चीज़ बद-से-बदतर होती हुई मालूम होती है, उसी समय हमें श्रद्धा का परम कर्म करना चाहिये और यह जानना चाहिये कि भागवत कृपा हमें कभी निराश नहीं करेंगी ।
(रेखांकित शब्दों की व्याख्या)
मेरा मतलब है , परिणामों की परवाह किये बिना अपने आंतरिक विश्वास के साथ काम करना और बाहरी तौर पर उल्टे प्रमाणों के होते हुए भी अपनी श्रद्धा को अडिग रखना।
संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१७)
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