‘सच्चा प्रेम’ जो तृष्टि और आलोकित करता है, वह नहीं है जिसे तुम पाते हो, बल्कि वह है जो तुम देते हो। और ‘परम प्रेम ‘ ऐसा प्रेम है जिसका कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता, वह ऐसा प्रेम है जो प्रेम करता है क्योंकि वह प्रेम करने के सिवा कुछ कर ही नहीं सकता ।

संदर्भ : विचार और सूत्र के प्रसंग में 

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