जब व्यक्ति किसी परिणामकी आशा से कार्य करता है और यदि परिणाम वह नहीं आता जिसे वह चाहता था तो वह इसे दुर्भाग्य कहता है। साधारणतया ऐसी प्रत्येक घटना जो इच्छा के विपरीत होती है या जिसे शंका की दृष्टि से देखा जाता है सामान्य मनको दुर्भाग्य प्रतीत होती है। यह दुर्भाग्य क्यों आता है ? प्रत्येक अवस्था में कारण भिन्न होता है; बल्कि घटना के बाद ही, वस्तुओंको समझने की आवश्यकता हमें इस बातके कारण खोजने को प्रेरित करती है कि यह घटना क्यों हुई थी। किन्तु अधिकतर परिस्थिति-सम्बन्धी हमारा ज्ञान अन्धा और भ्रान्तिपूर्ण होता है। हम अज्ञान में ही फैसला दे बैठते हैं। और फिर बाद में ही, कभी-कभी तो बहुत देर के बाद, हम आवश्यक दूरी पर खड़े होकर परिस्थितियोंकी शृंखला तथा समग्र परिणामको देखते हैं, और तभी वस्तुओंके वास्तविक स्वरूपको भी देखते हैं। हम देखते हैं कि जो चीज हमें बुरी लगती थी वह वस्तुतः बड़ी उपयोगी थी और उसने हमारे आवश्यक विकास में सहायता पहुंचायी थी।
संदर्भ : विचार और सूत्र के विषय में
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…