भगवान के लिए सच्चा प्रेम है आत्मदान, यानी अपने-आपको पूर्ण रूप से दे देना । इस दान में कोई मांग न हो, यह पूरी तरह से स्वयं का उत्सर्ग होः न इसमें कोई दावा हो, न शतें, न कोई सौदेबाजी हो और न ही हों ईर्ष्या,दम्भ या क्रोध के उग्र आवेग-क्योंकि आत्मोत्सर्ग में इन चीजों का कोई स्थान ही नहीं है। बदले में जगज्जननी भी स्वयं को आन्तरिक रूप से पूरी तरह से तुम्हें दे देती हैं-तुम्हारे मन, प्राण और शरीर में वे अपनी उपस्थिति उंडेल देती हैं, उनकी शक्ति तुम्हें भागवत प्रकृति में गढ़ती है, तुम्हारे स्वभाव, तुम्हारी सत्ता की सभी क्रियाओं को पूर्णता के पथ पर आगे बढ़ाती है, उनका प्रेम तुम्हें चारों ओर से घेर लेता है और वे तुम्हें अपनी बांहों में लेकर देवत्व की ओर ले जाती हैं। तुम्हें अपने तन-मन से यही अभीप्सा करनी चाहिये कि अपनी सत्ता के प्रत्येक भाग में स्थूल से स्थूल हिस्सों में भी-तुम जगज्जननी का अनुभव करोगे, उन्हीं को अपने हृदय में बसाये रखोगे और यहां समय की चिन्ता न करो, उसकी कोई पाबन्दी नहीं है। अगर तुम सचमुच इसकी अभीप्सा करोगे तो निश्चित रूप से इसे पा लोगे। यहां किसी भी दावे, शर्त या निराशा का प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि जैसे-जैसे तुम मां के हाथों अपने-आपको सौंपते चले जाओगे, तुम शुद्ध होते जाओगे और तुम्हारी प्रकति आवश्यक परिवर्तन से गुजरती रहेगी।

मां के प्रति अपने प्रेम को सभी स्वार्थी दावों और कामनाओं से रहित रखो, और तुम देखोगे कि तुम उतना समस्त प्रेम पा रहे हो जितना सह
और आत्मसात् कर सकते हो।

संदर्भ : माताजी के विषय में

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