श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ
‘भागवत कृपा’ के सामने कौन योग्य है और कौन अयोग्य?
सभी तो उसी एक दिव्य ‘मां’ के बालक हैं।
‘उनका’ प्रेम उन सब पर समान रूप से फैला हुआ है।
लेकिन ‘वे’ हर एक को उसकी प्रकृति और ग्रहणशीलता के अनुसार देती हैं।
सन्दर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…
अभीप्सा का तात्पर्य है, शक्तियों को पुकारना । जब शक्तियाँ प्रत्युत्तर दे देती हैं, तब…