एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा एक पृष्ठ खोल लिया और एक वाक्य पढ़ा। क्या ये वाक्य किसी व्यक्ति को कोई संकेत या कोई निर्देशन दे सकते हैं? सच्चा उत्तर पानेके लिये हमें क्या करना चाहिये?

प्रत्येक व्यक्ति इसे कर सकता है। यह इस तरह किया जाता है : तुम एकाग्र होओ। “अब, वह निर्भर करता है इस बात पर कि तुम क्या चाहते हो। यदि तुम्हारे सामने कोई आंतरिक समस्या है और तुम उसका समाधान चाहते हो तो तुम उस समस्या पर एकाग्र होओ; यदि तुम यह जानना चाहते हो कि तुम किस स्थितिमें हो, और जिसे तुम नहीं जानते, और तुम जिस अवस्थामें हो उस पर थोड़ा प्रकाश पाना चाहते हो, तो तुम बस सरलता के साथ जरा आगे आओ और प्रकाश के लिये प्रार्थना करो। अथवा, बिलकुल सरल रूपमें, यदि तुम यह जाननेके लिये उत्सुक हो कि अदृश्य ज्ञान तुमको क्या बतलाना चाहता है, तुम एक क्षणके लिये नीरव और स्थिर बने रहो और फिर पुस्तक खोलो। मैं सर्वदा इसके लिये एक कागज- तराश लेनेकी सलाह दिया करती हूं क्योंकि वह अधिक नुकीला होता है। जब तुम एकाग्र होओ उसे तुम पुस्तक में घुसा दो और वह अपनी नोकसे किसी चीजको सूचित करेगा। तब, यदि तुम्हें मालूम हो कि एकाग्र कैसे हुआ जाता है, अर्थात् यदि तुम सचमुच कोई उत्तर पाने की अभीप्साके साथ इसे करो तो उत्तर हमेशा आता है।

सन्दर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५६ 

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