हे ज्योतिर्मय प्रेम ! तू मेरी समूची सत्तामें भर गया है और उसे आनंदित कर रहा है। क्या तुझे ग्रहण किया गया है, क्या तुझे दान कर दिया गया है? कौन कह सकता है ? कारण, तू स्वयं अपनेको ग्रहण करता और तू ही स्वयं अपने-आपको दे देता है; तू ही प्रत्येक वस्तुमें; प्रत्येक सत्तामें युगपत् सर्वश्रेष्ठ दाता और ग्रहीता है।
सन्दर्भ : प्रार्थना और ध्यान
(अधिकतर साधक) अहंकारी होते हैं और वे अपने अहंभाव को अनुभव या स्वीकार नहीं करते।…
अवतार की सम्भावना पर विश्वास करने या न करने से प्रकट तथ्य पर कोई फ़र्क़…
यदि चैत्य पुरुष की प्रकृति जाग्रत हो जाए, अपने पीछे विद्यमान माताजी की चेतना और…
भागवत चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। रूपांतर की भी विभिन्न अवस्थाएँ होती है। पहली…
मधुर मां, हम ईर्ष्या और प्रमाद से कैसे पिण्ड छुड़ा सकते या उन्हें ठीक कर…