हे ज्योतिर्मय प्रेम ! तू मेरी समूची सत्तामें भर गया है और उसे आनंदित कर रहा है। क्या तुझे ग्रहण किया गया है, क्या तुझे दान कर दिया गया है? कौन कह सकता है ? कारण, तू स्वयं अपनेको ग्रहण करता और तू ही स्वयं अपने-आपको दे देता है; तू ही प्रत्येक वस्तुमें; प्रत्येक सत्तामें युगपत् सर्वश्रेष्ठ दाता और ग्रहीता है।
सन्दर्भ : प्रार्थना और ध्यान
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…