हे ज्योतिर्मय प्रेम ! तू मेरी समूची सत्तामें भर गया है और उसे आनंदित कर रहा है। क्या तुझे ग्रहण किया गया है, क्या तुझे दान कर दिया गया है? कौन कह सकता है ? कारण, तू स्वयं अपनेको ग्रहण करता और तू ही स्वयं अपने-आपको दे देता है; तू ही प्रत्येक वस्तुमें; प्रत्येक सत्तामें युगपत् सर्वश्रेष्ठ दाता और ग्रहीता है।

सन्दर्भ : प्रार्थना और ध्यान

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