अब, हे परमेश्वर, चीजें बदल गयी है। विश्राम और तैयारी का काल समाप्त हो गया है। तूने इच्छा की है कि मैं निष्क्रिय और ध्यान-परायण सेविका के बदले सक्रिय और सिद्धि लाने वाली सेविका बनूं; तूने इच्छा की है कि सहर्ष स्वीकृति सहर्ष संग्राम में परिणत हो जाय, और वर्तमान समय में जो तेरा विधान अत्यंत शुद्ध तथा अत्यंत उच्च रूप ग्रहण करता जा रहा है उसकी परिपूर्णता में जो कुछ इस जगत में बाधा उत्पन्न कर रहा है उसके विरुद्ध में सतत और वीरतापूर्वक युद्ध करूं तथा उसके साथ-ही-साथ मैं उस शांत और अपरिवर्तनीय समता को प्राप्त करूं जो वर्तमान काल में पूरा होनेवाले तेरे विधानके प्रति समर्पण करने पर प्राप्त है, अर्थात् उस समय प्राप्त होती है जब हम उस विधान का विरोध करने वाली चीजोंके साथ सीधे संघर्ष नहीं करते, प्रत्येक परिस्थिति से अधिक-से-अधिक लाभ उठाते हैं, तथा संसर्ग, उदाहरण तथा धीमे संक्रमण के द्वारा कार्य करते हैं।
एक आंशिक और सीमित संग्राम में, पर जो महान् पृथ्वीव्यापी संग्राम का प्रतिनिधि है उसमें, तू मेरी शक्ति, मेरी दृढ़ता और मेरे साहसकी परीक्षा कर रहा है, जिसमें कि तू देख सके कि मैं सचमुच तेरी सेविका बन सकती हूं या नहीं। यदि युद्ध का परिणाम यह सूचित करे कि मैं तेरे पुनर्जीवनदायी कर्म का यंत्र बनने के योग्य हूं तो तू कर्म का क्षेत्र प्रसारित कर देगा। और तू मुझसे जो कुछ आशा करता है उसकी ऊंचाई तक यदि मैं सर्वदा ऊपर उठ सकू तो, हे नाथ, एक दिन ऐसा आयेगा जब तू इस पृथ्वी पर उतर आयेगा और समूची पृथ्वी तेरे विरुद्ध उठ खड़ी होगी। परंतु तू पृथ्वीको अपनी मुजाओंमें उठा लेगा और पृथ्वी रूपांतरित हो जायगी।
सन्दर्भ : प्रार्थना और ध्यान
जीवनयात्रा में समस्त भय, संकट और विपदा का सामना करने के लिए कवच के रूप…
अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो ।…
सारी समस्या का निचोड़ यह है : बुद्धि के मानसिक प्रशासन की जगह आध्यात्मिक चेतना…