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हमारी क्रतज्ञता तथा उत्सर्ग

हे समस्त वरदानों के ‘परम वितरक’, तुझे, जो इस जीवन को शुद्ध सुन्दर और शुभ बना कर उसे औचित्य प्रदान करता है,  तुझे, हे हमारी नियति के स्वामी, हमारी अभीप्साओं के लक्ष्य …

हम प्रगाढ़ भक्ति और असीम क्रतज्ञता के साथ तेरी हितकारी भव्यताओं के आगे प्रणत हैं।

हमारे विचारों, हमारे भावों और हमारे कर्मों का प्रभुसत्तासंपन्न स्वामी हो जा ।

तू ही हमारी सत्ता की यथार्थता, एकमात्र सद्व्स्तु है ।

तेरे बिना सब कुछ मिथ्या और भ्रम है, सब कुछ दु:खपूर्ण अन्धकार है ।

तेरे अन्दर ही है जीवन, ज्योति और आनन्द।

तेरे ही अन्दर है परम शान्ति।

संदर्भ : प्रार्थना और ध्यान 

 

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