तू ही मेरे जीवनका एकमात्र लक्ष्य, मेरी अभीप्सा का केंद्र, मेरे चिंतन की धुरी, मेरे समन्वय की कुंजी है; और चूंकि तू सब वेदनों, सब मावों गया सब विचारोंसे परे है, तू जीवंत पर अनिर्वचनीय अनुभव वह सद्वस्तु है जिसे मनुष्य अपने अस्तित्वकी गहराईमें जीवनद्वारा अधिगत करता है, परंतु जिसे हमारे दरिद्र शब्दोंमें नहीं उतारा जा सकता; और चूंकि मनुष्यकी बुद्धि तुझे सूत्रमें सीमाबद्ध करने में असमर्थ है इसलिये कई तेरे उस ज्ञानको जो कि हमें प्राप्त हो सकता है कुछ तिरस्कारके साथ “भाव” कहते हैं, परंतु वह ज्ञान निश्चय ही भावसे भी उतना ही दूर है जितना विचारसे। जबतक मनुष्य इस परम ज्ञानको प्राप्त नहीं कर लेता तबतक उसे अपने मानसिक तथा भावपक्षीय संगठन- का सुनिश्चित आधार तथा स्थायी केंद्र नहीं मिलता, तबतक सब प्रकारकी अन्य बौद्धिक बनाएं मी निराधार, कृत्रिम तथा थोथी ही रहती है।

जहां तक हम तुझे अनुभव कर सकते हैं, तू शाश्वत नीरवता तथा पूर्ण शांति है।

तू ही वह सब पूर्णता है जिसे हमें प्राप्त करना है, वे सब चमत्कार है जिन्हें हमें उपलब्ध करना है, वह सब ओज-तेज है जिसे हमें अभिव्यक्त करना है।

हमारी भाषा बच्चों की तुतलाहट मात्र होती है, जब कि हम तेरे विषयमें कुछ कहनेका साहस करते हैं।

मौन में ही सबसे अधिक आदर है।

सन्दर्भ : प्रार्थना और ध्यान 

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