हे प्रभु ! तू क्या मुझे यह शिक्षा देना चाहता है कि जिन सब प्रयासों- का लक्ष्य मेरी अपनी सत्ता होगी वे निरुपयोगी और व्यर्थ हो जायेंगे? जिस कर्म का उद्देश्य तेरी कृपा को विकीर्ण करना होता है बस वही सुगमता और सफलता के साथ पूरा होता है। जब मेरी संकल्प-शक्ति बहिर्मुखी कर्म में संलग्न होती है तब वह शक्तिशाली और फलदायी बन जाती है; जब वह अंतर्मुखी कार्यमें प्रवृत्त होनेकी चेष्टा करती है तब वह बलहीन और प्रभाव- रहित हो जाती है। …… इस तरह व्यक्तिगत उन्नति के लिये किया गया प्रत्येक कार्य अधिकाधिक निष्फल होता जाता है और फलस्वरूप क्रमशः विरल भी होता जाता है। पर, इसके विपरीत, बाहरी कार्य उतना ही अधिक फलदायक होता हुआ प्रतीत होता है जितना अधिक आंतरिक कार्य विफल होता है। इस प्रकार, हे प्रभुवर, यह यंत्र जैसा है बस वैसा ही तू इसे ग्रहण करता है, और यदि इसे तीक्ष्ण होने की आवश्यकता होगी तो यह कार्य करते-करते ही तीक्ष्ण हो जायगा।

सन्दर्भ :प्रार्थना और ध्यान

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