जब तक कि मनुष्य अपने अन्दर गहराई में नहीं जीता और बाहरी क्रिया-कलापों को बस सत्ता की सतह के रूप में नहीं देखता, तब तक सांसारिक जीवन में शांति प्राप्त करना और उसे स्थायी बनाये रखना कभी आसान नहीं होता ।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग -३)
श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे…
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…