जो मन की पहुँच से अति परे है मैं वह परम गुह्यता हूं,
सूर्यों की श्रमसाध्य परिक्रमाओं की मैं लक्ष्य हूं;
मेरी ज्वाला और माधुर्य ही इस जीवन का कारण है ।
संदर्भ : “सावित्री”
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