जो मन की पहुँच से अति परे है मैं वह परम गुह्यता हूं,
सूर्यों की श्रमसाध्य परिक्रमाओं की मैं लक्ष्य हूं;
मेरी ज्वाला और माधुर्य ही इस जीवन का कारण है ।
संदर्भ : “सावित्री”
जीवनयात्रा में समस्त भय, संकट और विपदा का सामना करने के लिए कवच के रूप…
अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो ।…