श्रीमाँ के साथ आन्तरिक संपर्क बढ़े – जब तक वह न होगा, बाहरी संपर्को की बहुलता के द्वारा आसानी से अपने जीवन के उसी समान ढर्रे पर चलते रहोगे।
संदर्भ : माताजी के विषय में
श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे…
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…