जो मन की पहुँच से अति परे है मैं वह परम गुह्यता हूं,
सूर्यों की श्रमसाध्य परिक्रमाओं की मैं लक्ष्य हूं;
मेरी ज्वाला और माधुर्य ही इस जीवन का कारण है ।
संदर्भ : “सावित्री”
मैं तुम्हें अपना पुराना मन्त्र बताती हूं; यह बाह्य सत्ता को बहुत शान्त रखता है…
अगर अपात्रता का भाव तुम्हें उमड़ती हुई कृतज्ञता से भर देता है और आनन्दातिरेक के…
कभी मत बुड़बुड़ाओ । जब तुम बुड्बुड़ाते हो तो तुम्हारे अन्दर सब तरह की शक्तियां…