जो मन की पहुँच से अति परे है मैं वह परम गुह्यता हूं,
सूर्यों की श्रमसाध्य परिक्रमाओं की मैं लक्ष्य हूं;
मेरी ज्वाला और माधुर्य ही इस जीवन का कारण है ।
संदर्भ : “सावित्री”
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…