सागर के समान अपनी करुणा औ’ मन्दिर की-सी नीरवता को लेकर
उसकी आन्तर सहायता, सबके ही लिए द्वार अब दीव का खोल रही थी ;
उसके अन्तरतम का प्रेम निराला इस सारी जगति से भी विस्तृत था,
उसके एक अकेले अन्तर में ही यह सारा जग आश्रय ले सकता था ।
संदर्भ : सावित्री
तुम्हें जो चीज़ जाननी चाहिये वह है, ठीक तरह से यह जानना कि तुम जीवन…
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…