सागर के समान अपनी करुणा औ’ मन्दिर की-सी नीरवता को लेकर

उसकी आन्तर सहायता, सबके ही लिए द्वार अब दीव का खोल रही थी ;

उसके अन्तरतम का प्रेम निराला इस सारी जगति से भी विस्तृत था,

उसके एक अकेले अन्तर में ही यह सारा जग आश्रय ले सकता था ।

संदर्भ : सावित्री 

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