तुम जो कुछ भी करो वह उपयोगी हो उठता है यदि तुम उसमें सत्य चेतना की एक चिंगारी रख दो।
तुम जो कार्य करते हो उसकी अपेक्षा, तुम्हारें अंदर जो चेतना है वह बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण है। और अगर सत्य-चेतना द्वारा की जायें तो सबसे अधिक निरर्थक दिखने वाली क्रियाएँ भी बहुत सार्थक हो उठती है ।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)
मैं तुम्हें अपना पुराना मन्त्र बताती हूं; यह बाह्य सत्ता को बहुत शान्त रखता है…
अगर अपात्रता का भाव तुम्हें उमड़ती हुई कृतज्ञता से भर देता है और आनन्दातिरेक के…
कभी मत बुड़बुड़ाओ । जब तुम बुड्बुड़ाते हो तो तुम्हारे अन्दर सब तरह की शक्तियां…