सृष्टि का स्वामी हमारे अन्तर में छिपा बसता है
और अपनी आत्म चित्शक्ति के साथ लुका-छिपी खेलता है;
रहस्यमय परमेश्वर विश्व-प्रकृति में उसका साधन बन रमता है।
संदर्भ : “सावित्री”
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