मन जिसे जानता नहीं था ऐसे सत्य ने अपना मुख प्रकटा दिया
तब हम वह श्रवण कर सकते हैं, जो नश्वर कानों ने पहले कभी नहीं सुना था,
हम वह अनुभूति पाते जिसे पार्थिव बोध ने कभी अनुभव नहीं किया,
हम उसे प्रेम करते हैं जिसे सामान्य ह्रदय परे हटाता घृणा करता है;
एक तेजस्वी सर्वज्ञता के सम्मुख हमारे मन शान्त मौन हो जाते हैं;
अन्तरात्मा के कक्षों से एक दिव्य वाणी पुकारती है;
अमर-अग्नि के स्वर्णिम अन्तरधाम में
हमें प्रभु-स्पर्श की आनन्दानुभूति मिलती है।
संदर्भ : “सावित्री”
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…