हमारे अन्तर में एक आकारहीन स्मृति अभी तक चिपकी है
औ’ कभी-कभी, जब हमारी द़ृष्टि अन्तर्मुखी होती है,
पार्थिवता का अज्ञान-पट हमारी आंखों से उठा देती है;
तब वहां एक अल्पकालीन अद्भुत मुक्ति में हम पहुंच जाते हैं।
संदर्भ : “सावित्री”
भगवान के प्रति पूर्ण आत्म-दान के लिए तीन विशेष विधियाँ : (१) सारे गर्व को…
श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे…
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…