उन घड़ियों में जब अन्तर के प्रकाश दीप जल उठते हैं
और इस जीवन के प्राणप्रिय अतिथि बाहर छूट जाते हैं,
हमारी चैत्य-सत्ता एकाकी बैठ निज गर्तों से सम्पर्क करती है।
संदर्भ : “सावित्री”
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