भगवान स्वयं मार्ग पर चल कर मनुष्यों को राह दिखाने के लिए मनुष्य का रूप धारण करते हैं और बाहरी मानव-प्रकृति को स्वीकार करते हैं। पर इससे उनका ‘भगवान’ होना समाप्त नहीं हो जाता। यह एक अभिव्यक्ति होती है, बढ़ती हुई भागवत चेतना अपने-आपको प्रकट करती है। यह मनुष्य का भगवान में बदल जाना नहीं है।

संदर्भ : प्रार्थना और ध्यान 

शेयर कीजिये

नए आलेख

उपस्थिति का अनुभव

हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…

% दिन पहले

ध्यान कहाँ?

मधुर माँ , यहाँ  अपने कमरे में बैठ कर ध्यान करने और सबके साथ खेल…

% दिन पहले

प्रगतिशील बनों

कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…

% दिन पहले

केवल एक सहारा

भगवान के सिवा कभी किसी दूसरे मनुष्य या दूसरी वस्तु पर, वह चाहे जो हो…

% दिन पहले

श्रीमाँ के बालक

तुम माँ के बच्चे हो और माँ का अपने बच्चों के प्रति प्रेम असीम होता…

% दिन पहले

कामनाएँ

यदि अच्छी कामनाएँ हैं तो बुरी कामनाएँ भी आयेंगी। संकल्प और अभीप्सा तो साधना के…

% दिन पहले