‘भागवत उपस्थिति’ दिन-रात सतत मौजूद है ।
चुपचाप अन्दर की ओर मुड़ना काफी है और हम उसे पा लेंगे ।
संदर्भ :माताजी के वचन (भाग – २)
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…