मधुर माँ ,
एक लम्बे अरसे से मैं देख रहा हूँ कि मैं कुछ लजीला-सा हूं । मेरे अन्दर हीन-भावना है । मेरा ख्याल है कि मुझे डर रहता है कि लोग मेरे अज्ञान को जान जायेंगे । मैं ऐसा क्यों हूं ? मैं इसमें से कैसे बाहर निकाल सकता हूं ?
इन सबके और इस विख्यात हीनता-ग्रंथि के पीछे होता है अहंकार और उसका दम्भ जो अपना अच्छा रूप दिखाना चाहता है और औरों से प्रशंसा चाहता है ; लेकिन अगर तुम्हारा समस्त क्रिया-कलाप भगवान के प्रति उत्सर्ग हो तो तुम औरों की प्रशंसा की जरा भी परवाह न करोगे।
संदर्भ : माताजी के पत्र (भाग – १६)
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