समस्त अधो जगत में व्याप्त है तू, जो ,
फिर भी बैठा ऊपर दूर परे ;
कर्मी, शासक, ज्ञानी, सबका स्वामी है तू,
फिर भी सेवक बन जाता प्रेम का !
नहीं तुझे इन्कार बन जाने में भी कीट,
और न ही लोष्ठवत हो जाने में अपमान ;
इसलिए, तेरी विनय से जानते है हम,
कि निश्चय ही, होगा तू भगवान।
संदर्भ : SABCL खण्ड-५
मैं तुम्हें अपना पुराना मन्त्र बताती हूं; यह बाह्य सत्ता को बहुत शान्त रखता है…
अगर अपात्रता का भाव तुम्हें उमड़ती हुई कृतज्ञता से भर देता है और आनन्दातिरेक के…
कभी मत बुड़बुड़ाओ । जब तुम बुड्बुड़ाते हो तो तुम्हारे अन्दर सब तरह की शक्तियां…