मधुर माँ,
अंतरात्मा की क्या भूमिका है ?
अंतरात्मा के बिना तो हमारा अस्तित्व ही न होगा !
अंतरात्मा वह है जो कभी भी भगवान को छोड़े बिना उनसे आती है और अभिव्यक्त होना बन्द किये बिना उनके पास लौट जाती है।
अंतरात्मा भगवान है जिसे भगवान होना छोड़े बिना व्यक्ति बनाया गया है।
अंतरात्मा में व्यक्ति और भगवान शाश्वत रूप से एक हैं; अतः, अपनी अंतरात्मा को पाने को अर्थ है भगवान को पाना, अपनी अंतरात्मा के साथ तादाम्य पाने का अर्थ है भगवान के साथ एक होना।
अतः, यह कहा जा सकता है कि अंतरात्मा का कार्य है मनुष्य को एक सच्ची सत्ता बनाना।
संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड -१६)
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