हे प्रभु ! तू क्या मुझे यह शिक्षा देना चाहता है कि जिन सब प्रयासों- का लक्ष्य मेरी अपनी सत्ता होगी वे निरुपयोगी और व्यर्थ हो जायेंगे? जिस कर्म का उद्देश्य तेरी कृपा को विकीर्ण करना होता है बस वही सुगमता और सफलता के साथ पूरा होता है। जब मेरी संकल्प-शक्ति बहिर्मुखी कर्म में संलग्न होती है तब वह शक्तिशाली और फलदायी बन जाती है; जब वह अंतर्मुखी कार्यमें प्रवृत्त होनेकी चेष्टा करती है तब वह बलहीन और प्रभाव- रहित हो जाती है। …… इस तरह व्यक्तिगत उन्नति के लिये किया गया प्रत्येक कार्य अधिकाधिक निष्फल होता जाता है और फलस्वरूप क्रमशः विरल भी होता जाता है। पर, इसके विपरीत, बाहरी कार्य उतना ही अधिक फलदायक होता हुआ प्रतीत होता है जितना अधिक आंतरिक कार्य विफल होता है। इस प्रकार, हे प्रभुवर, यह यंत्र जैसा है बस वैसा ही तू इसे ग्रहण करता है, और यदि इसे तीक्ष्ण होने की आवश्यकता होगी तो यह कार्य करते-करते ही तीक्ष्ण हो जायगा।
सन्दर्भ :प्रार्थना और ध्यान
व्यक्तिगत जीवन का प्रयोजन है भगवान को खोजने और उनके साथ एक होने का आनन्द…
प्रिय माताजी, हमारा सच्चा आध्यात्मिक जीवन कहां से आरंभ होता है? सच्चा आध्यात्मिक जीवन तब…
मां, क्या खेल-प्रतियोगिताएं हमारी प्रगति के लिये आवश्यक है? नैतिक शिक्षाकी दृष्टिसे वे काफी हद…
आध्यात्मिक भाव पूजा, भक्ति और निवेदन के धार्मिक भाव के विपरीत नहीं है, धर्म में…
तू ही मेरे जीवनका एकमात्र लक्ष्य, मेरी अभीप्सा का केंद्र, मेरे चिंतन की धुरी, मेरे…