पथ पर डटे रहो


श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

तुम सभी, मेरे बच्चो, मैं तुमसे यह कह सकती हूँ, मैंने यह कई बार दोहराया है और एक बार फिर दोहरा रही हूँ-तुमलोग एक असाधारण
स्वतन्त्रता में जी रहे हो। बाहरी रूप में छोटी-मोटी सीमाएँ हैं, क्योंकि, तुमलोग काफ़ी संख्या में हो और सारी पृथ्वी तुम्हारे सुपुर्द नहीं की गयी है, इसलिए एक हद तक किसी अनुशासन का अधिकार मानना पड़ता है ताकि बहुत अव्यवस्था न फैलने पाये; लेकिन आन्तरिक रूप में तुमलोग एक अनूठी स्वतन्त्रता में जी रहे हो : न सामाजिक बन्धन, न नैतिक बन्धन, न कोई बौद्धिक बन्धन, कोई नियम नहीं, कुछ नहीं, केवल एक प्रकाश है यहाँ। अगर तुम उससे लाभ उठाना चाहते हो तो तुम लाभ उठाते हो; अगर नहीं उठाना चाहते तो उसके लिए भी तुम स्वतन्त्र हो।

लेकिन जिस दिन तुम चुनाव कर लो-जब तुमने वह चुनाव अपनी पूरी सच्चाई के साथ किया हो, और अपने अन्दर एक मौलिक संकल्प का
अनुभव किया हो-तब बात अलग है। अनुसरण करने के लिए तब एक बिलकुल सीधा पथ और एक प्रकाश होता है, और उससे तुम्हें च्युत नहीं होना चाहिये। जानते हो, वह किसी को धोखा नहीं देता; योग कोई मज़ाक नहीं है। जब तुम चुनाव करो तो तुम्हें मालूम होना चाहिये कि तुम क्या कर रहे हो। लेकिन एक बार चुन लो तो तुम्हें उस पर डटे रहना चाहिये। तब तुम्हें आगा-पीछा करने का कोई अधिकार नहीं रहता। तुम्हें बिलकुल सीधे आगे बढ़ना चाहिये। लो! मैं जिस चीज़ की माँग कर रही हूँ वह है भली-भाँति करने का संकल्प, प्रगति के लिए प्रयास और साधारण मनुष्यों से कुछ अधिक अच्छा जीवन जीने की चाह। तुम बड़े हए हो, तुम्हारा विकास असाधारण रूप से प्रकाशमान, सचेतन, सामञ्जस्यपूर्ण और सद्भावनापूर्ण परिवेश में हआ है। और इस परिवेश के उत्तर में तम्हें जगत् में इसी प्रकाश, इसी सामञ्जस्य, इसी सद्भावना की अभिव्यक्ति बनना चाहिये। यह अपने-आपमें बहत अच्छा होगा, बहुत अच्छा।

इस योग को, रूपान्तरण के इस योग को, जो सभी चीज़ों में सबसे अधिक दुःसाध्य है, केवल तभी करो जब तुम यह अनुभव करो कि तुम
यहाँ इसीलिए आये हो (यहाँ से मेरा मतलब है पृथ्वी पर) और इसके सिवाय तुम्हारा कोई काम नहीं है, कि तुम्हारे अस्तित्व का यही एकमात्र कारण है-चाहे इसके लिए तुम्हें बहुत अधिक परिश्रम करना पड़े, कष्ट उठाने पड़ें, संघर्ष करने पड़ें, उसका कोई महत्त्व नहीं-“मैं यही चाहता हूँ, और कुछ नहीं”-तब और बात है। वरना मैं कहूँगी : “खुश रहो और नेक बनो, केवल इसी की मैं तुमसे माँग करती हूँ। नेक होने का अर्थ समझदार होने से है, यह जानना कि जिन अवस्थाओं में तुम पले वे असाधारण है । और साधारण जीवन से अधिक ऊँचा, अधिक श्रेष्ठ, अधिक सच्चा जीवन जीने की कोशिश करो, ताकि इसके द्वारा इस चेतना का, इस प्रकाश का और इसकी नेकी का थोड़ा-सा अंश धरती पर अभिव्यक्त हो सके। यह बहुत अच्छा होगा।” बस यही।

लेकिन एक बार योग-मार्ग पर क़दम रख लिया तो तम्हारे अन्दर इस्पात का संकल्प होना चाहिये और, किसी भी कीमत पर तुम्हें सीधे
लक्ष्य की ओर ही बढ़ना चाहिये।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५५


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