सतत उपस्थिति

श्री अरविंद आश्रम की श्री माँ का चित्रा

हमेशा इस तरह रहो मानों तुम परात्पर प्रभु और भगवती माता की आंखों के एकदम नीचे हो । कोई ऐसा काम मत करोकुछ भी ऐसा सोचने और अनुभव करने की चेष्टा मत करो जो भागवत उपस्थिति के लिये अनुपयुक्त हो ।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

केवल अंश ही

महर्षि श्री अरविंद का चित्र

पूर्णयोग के साधक को यह अवश्य स्मरण रखना चाहिये कि कोई भी लिखित शास्त्र नित्य ज्ञान के केवल कुछ एक अंशों को ही प्रकट कर सकता है, चाहे उसकी प्रामाणिकता कितनी भी महान् क्यों न हो अथवा उसकी भावना कितनी भी विशाल क्यों न हो ।

संदर्भ : योग समन्वय 

पहली आवश्यकता

महायोगी श्री अरविंद का चित्र

अगर मन चंचल हों तो योग की नींव डालना संभव नही । सबसे पहले यह आवश्यक है कि मन अचंचल हो । और व्यक्तिगत चेतना का लय कर देना भी इस योग का प्रथम उद्देश्य नही हैबल्कि प्रथम उद्देश्य है व्यक्तिगत चेतना को एक उच्चतर आध्यात्मिक चेतना की ओर खोल देना और इसके लिये भी जिस बात की सबसे पहले आवश्यकता हैं वह है मन की अचंचलता ।

सन्दर्भ : श्री अरविंद के पत्र भाग २

श्रद्धा और समर्पण

श्री अरविंद आश्रम की श्री माँ का चित्र

तुम्हारी श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण जितने अधिक संपूर्ण होंगे उतना ही अधिक तुम कृपापात्र और सुरक्षित होओगे ! और यदि मां भगवती की कृपा और रक्षक हाथ तुम पर हों तो ऐसा क्या है जो तुम्हें स्पर्श कर सके या जिसका तुम्हें भय हो? उसका अल्पांश भी तुम्हें सकल कठिनाइयों, बाधाओं और संकटों के पार कर देगा; उससे पूरे घिरे रहने पर तो, चूंकि वह पथ मां का ही है, तुम अपने पथ पर निरापद चल सकते हो तब तुम्हें किसी संकट की चिंता नहीं, तुम्हें कोई भी वैरता छू नहीं सकती वह चाहे कितनी ही सबल क्यों न हो, इस जगत् की हो या अदृश्य जगत् की । उसका स्पर्श कठिनाई को सुयोग में, विफलता को सफलता में और दुर्बलता को अडिग बल में बदल दे सकता है । कारण, मां भगवती को अनुकंपा परमेश्वर की अनुमति है और आज या कल उसका फल निश्चित है, पूर्व निर्दिष्ट, । अवश्यंभावी और अनिवार्य है !

सन्दर्भ : माताजी के विषय में 

श्री माँ के श्री चरण

The Mother's Divine Feet

मेज़ पर बैठी लिख रही हूं । बिलकुल सामने माँ के श्रीचरण हैं । देखते -देखते मन अपार्थिव आनंद से भर उठा। याद आया – किस तरह माँ के श्रीचरण प्राप्त हुए थे । प्रतिवर्ष जन्मदिन मनाने से पहले श्री माँ पूछती थी, “क्या चाहिये?” आश्चर्य की बात है ठीक उसी समय कोई इच्छा नहीं रहती थी । किसी तरह से कुछ भी मन में नहीं आता था । सीढ़ी से नीचे आने पर मन में आता कि अगले जन्मदिन पर माँ के श्रीचरण की एक फोटो मांग लूँगी । किन्तु हर वर्ष वही पुनरावृत्ति होती – अर्थात उस समय सब भूल जाती ।

“क्या चाहिये” सुनने मात्र से ही सब विस्मृति के अटल में डूब जाता । क्यों ऐसा होता था, मैं नहीं जानती । ऐसा लगता था मेरी कुछ भी इच्छा या चाह नहीं है ।

सन १९७२ मेँ मैंने माँ के चरणों मेँ अंतिम बार प्रणाम किया । यथारीति प्रणाम करके, माँ से आशीर्वाद-पुष्प लेकर जब लौट रही थी तब अचानक चम्पकलाल जी ने मुझे आवाज़ लगायी, ” प्रीति ! माँ तुम्हें बुला रही है । ” मैं जल्दी से दरवाजे के पास से माँ के पास आयी । अभी मैं  बैठ ही रही थी कि चम्पकलाल जी ने माँ के हाथ मेँ एक रंगीन श्रीचरण की फोटो दी और माँ ने मधुर भाव से हँसते हुए वह फोटो मुझे दे दी ।

 

Divine feet of The Mother Sri Aurobindo Ashram

मैं तो हैरान रह गयी । आनंद से भर गयी । सोचने लगी – ऐसा भी संभव है क्या ? माँ ने आज मेरी इतने वर्षों की आकांशा पूरी कर दी !! माँ को पुनः प्रणाम किया , मन ही मन बोली –

“निरखा, प्राण निछावर हो गये

चेरी भई श्रीचरण की ।”

 

धीर, शांत भाव से लौट आयी । सीढ़ी से नीचे उतरते – उतरते मन मेँ रही थी – कैसा आश्चर्य ! इतने वर्षों की मेरी आकांशा आज कैसे पूर्ण हुई ! कृतज्ञता से मन का कोना – कोना भर उठा ।

जहां (नीचे) अब माँ की शैया है, वहाँ काफी देर तक चुपचाप बैठी रही । तब मैं क्या जानती थी कि एक वर्ष के बाद इसी स्थान पर माँ का शरीर ऊपर से लाकर रखा जायेगा, और माँ के पास यह मेरा अंतिम जाना हुआ है । शायद इसी कारण माँ ने श्रीचरण देकर मेरी इतने दिनों की अभिलाषा पूर्ण की ।

 

संदर्भ : अविस्मरणीय वे क्षण ( प्रीति दास गुप्ता )

तीन शर्तें

Sri Aurobindo,श्री अरविंद का चित्र

भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन की चीजों में इसे क्रियाशील होने देने के लिए तीन आवश्यक शर्तें हैं :

१) अचंचलता, समता — जो कुछ घटित होता है उससे विक्षुब्ध नहीं होना, मन को निष्क्रिय तथा दृढ़ बनाये रखना, शक्तियों की क्रीड़ा को देखना, किन्तु स्वयं प्रशान्त बने रहना।

२) परम निष्ठा — यह विश्वास बनाये रखना कि वही घटित होगा जिसमें सब का कल्याण है। किन्तु यह भी कि यदि व्यक्ति अपने को सच्चा यन्त्र बना सके तब परिणाम को भागवत प्रकाश द्वारा निर्देशित व्यक्ति का संकल्प ‘‘कर्तव्यं कर्म’’ के रूप में देखेगा।

३) भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता तथा भागवत उपस्थिति तथा इसमें श्रीमाँ की उपस्थिति को महसूस करना तथा इसे अपनी दृष्टि, संकल्प व क्रिया को निर्देशित करने देना। यदि इस शक्ति तथा उपस्थिति को अनुभव किया जा सके और इस सुनम्यता को क्रियाशील चेतना की आदत बनाया जा सके तब अन्तिम परिणाम सुनिश्चित है। परन्तु सुनम्यता केवल भागवत शक्ति के प्रति होनी चाहिये जिसमें कोई विदेशी तत्व न हो।

 

संदर्भ : योग के आधार