धर्म : बाधक या सहायता

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

धर्म के कारण निकृष्टतम और उत्कृष्टतम दोनों प्रकार की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिला है। एक ओर यदि इसके नाम पर अत्यन्त भयानक युद्ध लड़े गये हैं और भयंकर अत्याचार किये गये हैं, तो दूसरी ओर इसने धर्म के कार्य के निमित्त परम शौर्य और आत्म-बलिदान के भावों को भी जगाया है। यदि तुम धर्म के बाह्य रूप के गुलाम हो जाओ तो यह बाधा है, एक बन्धन है; किन्तु यदि तुम इसके अन्दर के सार का उपयोग करना जानते हो, तो यह आध्यात्मिक भूमिका में कूद सकने के लिए सहायता
देने वाला तख्ता बन सकता है।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९२९-१९३१

श्रीमाँ के साथ संपर्क

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

जिन सत्ताओं का एक जीवन में आपके साथ संपर्क स्थापित हो जाता है क्या वे अपने नये जीवनों में हमेशा लौट कर आपके पास ही आती हैं ?

ऐसी सत्ताओं की संख्या बहुत ही कम है जो अपने चुने हुए स्थान पर सचेतन रूप से वापिस आती हैं ।

जो वापिस आयी हैं वे अधिकतर ऐसी सत्ताएँ हैं जिन्होने अपना शरीर छोड़ने से पहले नये शरीर में वापिस आने की मांग की थी।

लेकिन सब कुछ संभव है।

आशीर्वाद।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१७)

हर किसी के पास मत जाओ

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

जो लोग इस कारण यातना भोगते हैं कि उन्हें किसी तथाकथित संन्यासी से परिचित होने का दुर्भाग्य प्राप्त हुआ था, उनकी संख्या प्रचुर है, प्रचुर। मैं तुम्हें डराने के लिए यह बात नहीं कह रही हूं, क्योंकि तुम यहां सुरक्षित हो, बल्कि इसलिए कि यह एक तथ्य है। दीक्षा प्राप्त करते समय ये लोग प्राण-जगत् की किसी शक्ति का प्रभाव ग्रहण कर लेते हैं जो बहुत अधिक खतरनाक है…। सर्वदा ऐसी बात नहीं होती, परन्तु अधिकतर ऐसा ही होता है।

कारण, इस जगत् में सच्चाई इतना दुर्लभ गुण है कि यदि कोई इसे देखे तो उसे इसके सामने आदर के साथ सिर झुका देना चाहिये। “सच्चाई”, जिसे हम सच्चाई कहते हैं, अर्थात्, पूर्ण ईमानदारी और पारदर्शकता : अर्थात् कहीं कोई चीज ऐसी नहीं होनी चाहिये जो झूठा दावा करती हो, अपने को छिपाती हो अथवा जो कुछ वह नहीं है वैसी स्वीकृत होना चाहती हो।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५६

श्रीअरविंद से मिलना

श्रीअरविंद का चित्र

श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे मिलती हूं। कल रात मैंने उनके साथ कई घण्टे बिताये।

अगर तुम सूक्ष्म-भौतिक में सचेतन हो जाओ तो तुम निश्चय ही उनसे मिलोगे। यह वही है जिसे श्रीअरविन्द सच्चा भौतिक कहते हैं – उसका चैत्य से कोई रिश्ता नहीं।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

डर का इलाज

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

..अब एक छोटा-सा इलाज है जो बहुत सरल है, क्योंकि यह सहज बुद्धि के एक छोटे-से निजी प्रश्न पर आधारित है….। तुम्हें जरा अवलोकन करना चाहिये और कहना चाहिये कि जब तुम डरते हो तो मानों तुम्हारा डर उस चीज को खींच रहा है जिससे तुम डरते हो। अगर तुम बीमारी से डरते हो तो मानों तुम बीमारी को खींचते हो। अगर तुम किसी दुर्घटना से डरते हो तो मानों तुम दुर्घटना को आकर्षित करते हो। और अगर तुम अपने अन्दर और अपने चारों ओर जरा नजर डालो तो तुम यह जान लोगे, यह एक अटल सत्य है। तो अगर तुम्हारे अन्दर जरा भी सहज बुद्धि है तो तुम कहोगे : “किसी चीज से डरना मूर्खता है। यह तो ठीक वैसा है मानों में उसे अपने पास आने के लिए इशारा कर रहा हूं। अगर मेरा कोई दुश्मन होता जो मेरी हत्या करना चाहता तो मैं जाकर उससे यह न कहता : ‘जानते हो, मैं ही हूं जिसकी तुम हत्या करना चाहते हो।'” यह कुछ वैसी ही बात है। इसलिए, चूंकि डर बुरा है इसलिए हम उसे न रखेंगे। अगर तुम यह कहो कि तुम उसे तर्क करके रोक नहीं सकते तो इससे यह प्रकट होता है कि तुम्हें अपने ऊपर अधिकार नहीं है और तुम्हें अपने-आपको वश में करने के लिए कुछ प्रयास करना चाहिये। बस यही है।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५३

नयी चीज़ का डर

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

मधुर मां,

 हम प्रायः कोई नयी चीज करने से डरते हैं, शरीर नये तरीके से क्रिया करने से इन्कार करता है, जैसे जिम्नास्टिक्स में कोई नयी क्रिया करने या नयी तरह का गोता लगाने से। यह डर कहां से आता है? इससे कैसे पिण्ड छुड़ाया जा सकता है? और फिर, दूसरों को भी ऐसा करने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जाये?

शरीर हर नयी चीज से डरता है क्योंकि उसका आधार ही है जड़ता, तमस् प्राण ही उसमें रजस् या क्रियाशीलता का प्रधान लक्षण लाता है। इसीलिए साधारण नियमानुसार महत्त्वाकांक्षा, प्रतिस्पर्धा और दर्प के रूप में प्राण की घुसपैठ शरीर को तमस को झाड़ फेंकने और प्रगति के लिए आवश्यक प्रयास करने के लिए बाधित करती है।

स्वभावतः, जिनमें मन प्रधान है वे अपने शरीर को भाषण दे-देकर भय पर विजय पाने के लिए आवश्यक सभी युक्तियां जुटा सकते हैं।

सभी के लिए सर्वोत्तम उपाय है, भगवान् के प्रति आत्मोत्सर्ग और उनकी अनन्त कृपा पर विश्वास।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

सफल अध्यापक की विशेषताएँ

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

१. पूरा-पूरा आत्म-संयम, केवल इतना ही नहीं कि अपना क्रोध न दिखलाओ, बल्कि सभी परिस्थितियों में पूरी तरह शान्त. स्थिर और अविचल बने रहना।

२. आत्मविश्वास के मामले में, अपने महत्त्व को सापेक्षता का भी भान होना चाहिये।

सबसे बढ़ कर, यह ज्ञान होना चाहिये कि अगर अध्यापक चाहता है कि उसके विद्यार्थी प्रगति करें तो स्वयं उसे भी हमेशा प्रगति करनी चाहिये। उसे कभी भी वह जो है या वह जितना जानता है उससे सन्तुष्ट न होना चाहिये।

३. अध्यापक में अपने विद्यार्थियों से मूलभूत श्रेष्ठता का भाव न होना चाहिये और न ही उनमें से किसी के लिए वरीयता या आसक्ति।

४. उसे यह मालूम होना चाहिये कि आध्यात्मिक दृष्टि से सब समान हैं और उसके अन्दर केवल सहिष्णुता ही नहीं, व्यापक बोध और समझ होनी चाहिये।

५. “अध्यापक और माता-पिता दोनों का यह काम है कि बच्चे को अपने-आपको शिक्षित करने योग्य बनायें और इसमें सकी मदद करें, उसे अपनी बौद्धिक, नैतिक, सौन्दर्य-बोधात्मक और व्यावहारिक क्षमताओं को विकसित करने और एक मूलभूत सत्ता के रूप में खुले तौर पर विकसित होने में मदद दें जिसे जड़ लोचदार पदार्थ की तरह कोई आकार देने के लिए गूंधने या दबाने की ज़रूरत नहीं।”

संदर्भ : शिक्षा के ऊपर 

स्वप्न

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ तारा जौहर के साथ

मधुर मां,
 हम स्वप्न में अच्छे और बुरे में कैसे फर्क कर सकते हैं?

सिद्धान्त रूप में, नींद के क्रिया-कलाप का मूल्यांकन करने के लिए हमें उसी तरह की विवेक-शक्ति की जरूरत होती है जैसी जाग्रत क्रिया-कलाप को परखने के लिए।

लेकिन चूंकि हम सामान्यतः ऐसी बहुत-सी क्रियाओं को “स्वप्न” का नाम दे देते हैं जो एक-दूसरे से बहुत भिन्न होती हैं इसलिए जो चीज सबसे पहले सीखनी चाहिये वह है विभिन्न प्रकार की क्रियाओं में भेद कर सकना, यानी यह जानना कि सत्ता का कौन-सा भाग “स्वप्न” देख रहा है. हम किस क्षेत्र में “स्वप्न देख रहे है” और उस क्रिया की क्या प्रकृति है। श्रीअरविन्द ने अपने पत्रों में नींद की सभी क्रियाओं का पूरा-पूरा और विस्तृत वर्णन और स्पष्टीकरण दिया है। इस विषय का अध्ययन करने और
उसका व्यावहारिक उपयोग करने के लिए इन पत्रों को पढ़ना एक अच्छा परिचय प्राप्त है।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

प्राचीन चीज़ें और पूर्ण योग

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ का चित्र

मैं रामायण – महाभारत की कहानियों और तुलसी, कबीर, मीरा आदि के गीतों पर बहुत ज़ोर देता हूँ। क्या इन प्राचीन चीजों को जारी रखना आपके मार्ग के विपरीत है ?

हर्गिज नहीं – महत्व मनोवृत्ति का है। भूत को भविष्य की ओर उछलने का तख़्ता होना चाहिये, प्रगति को रोकने वाली जंजीर नहीं। जैसा कि मैंने कहा है, सब कुछ भूतकाल कीओर तुम्हारी मनोवृत्ति पर निर्भर करता है ।

संदर्भ : पथ पर 

प्रगति का मापदण्ड

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

मधुर मां, हम यह कैसे जान सकते हैं कि हम व्यक्तिगत और सामुदायिक रूप में प्रगति कर रहे हैं या नहीं?

हम प्रगति कर रहे हैं या नहीं इसका आकलन  करने की कोशिश न करना ही हमेशा वाञ्छनीय होता है क्योंकि इससे तुम्हें प्रगति करने में सहायता नहीं मिलती-बल्कि इसके विपरीत होता है। यदि प्रगति के लिए अभीप्सा सच्ची हो तो निश्चित रूप से वह परिणाम लायेगी। लेकिन तुम व्यक्तिगत या सामुदायिक रूप से चाहे जितनी प्रगति कर चुके हो, फिर भी जो प्रगति करनी बाकी है वह इतनी अधिक होती है कि राह में रुक कर, तुमने जो प्रगति की है उसका आकलन करने की कोई जरूरत नहीं।

की हुई प्रगति का बोध सहज रूप से, इस अचानक और अप्रत्याशित बोध से आना चाहिये कि तुम उसकी तुलना में क्या हो जो कुछ समय पहले थे। बस इतना ही-लेकिन इसके लिए भी तो चेतना के काफी उच्च  कोटि के विकास की जरूरत होती है।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)