श्रद्धा की सीमा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

जो श्रद्धा वैश्व भगवान के प्रति जाती है वह लीला की आवश्यकताओं के कारण अपनी क्रियाशक्ति में सीमित रहती है।

इन सीमाओं से पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए तुम्हें परात्पर भगवान तक पहुँचना चाहिये।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-३)

अप्रसन्नता

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ नलिनी कान्त गुप्त के साथ

जिस क्षण तुम दुःख अनुभव करने लगो उसी क्षण तुम उसके नीचे लिख सकते हो, “मैं सच्चा नहीं हूँ।” ये दो वाक्य साथ साथ चलते है

“मैं दुःखी हूँ।”

“मैं सच्चा नहीं हूँ।”

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

 

आध्यात्मिक भाव और धर्म

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

आध्यात्मिक भाव धार्मिक पूजाभाव, भक्ति और उत्सर्ग का विरोधी नहीं है। धर्म में ग़लती यह है कि मन एक ही सिद्धांत को ऐकान्तिक रूप से सत्य मान कर उससे ही चिपका रहता है। तुम्हें हमेशा याद रखना चाहिये कि सिद्धांत सत्य की केवल मानसिक अभिव्यक्ति हैं और यह भी कि यह सत्य हमेशा विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकता है।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

भारत का भविष्य

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

भारत का भविष्य बहुत स्पष्ट है। भारत संसार का गुरु है। संसार की भावी रचना भारत पर निर्भर है। भारत जीवित-जाग्रत आत्मा है। भारत संसार में आध्यात्मिक ज्ञान को जन्म दे रहा है। भारत सरकार को चाहिये कि इस क्षेत्र में भारत के महत्व को स्वीकार करे और अपने कार्यों की योजना उसी के अनुसार बनाये ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

पूर्णयोग की साधना

श्रीअरविंद का चित्र

इस योग की साधना का कोई बँधा हुआ मानसिक अभ्यासक्रम या ध्यान का कोई निश्चित प्रकार अथवा कोई मंत्र या तंत्र नहीं है। बल्कि यह साधना साधक के ह्रदय की अभीप्सा से आरम्भ होती है ; साधक अपनी ऊर्ध्वस्थित या अंतःस्थित आत्मा का ध्यान करता है, अपने-आपको भागवत प्रभाव की ओर, ऊपर स्थित भागवत शक्ति और उसके कार्य की ओर तथा ह्रदय में विद्यमान भागवत उपस्थिति की ओर उद्घाटित कर देता है और जो कुछ इन बातों के लिए विजातीय है उस सबका परित्याग कर देता है। केवल श्रद्धा, अभीप्सा तथा आतमसमर्पण के द्वारा ही यह आत्मोद्घाटन हो सकता है।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र

क्या होगा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

एक परम चेतना है जो अभिव्यक्ति पर शासन करती हैं। निश्चय ही उसकी बुद्धि हमारी बुद्धि से बहुत महान है। इसलिए हमें यह चिंता नहीं करनी चाहिये कि क्या होगा।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

अहंकार

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

अहंकार नाराज़ और बेचैन हो उठता है और यही अहंकार तुम्हारी चेतना को धुँधला बनाता और तुम्हारी प्रगति में बाधा डालता है।

अहंकार इसलिए नहीं बदलता क्यों की उसे इस निश्चिति का अनुभव होता है कि वह हमेशा ठीक होता है ।

आशीर्वाद।

संदर्भ : श्री मातृवाणी (खण्ड -१७)

अनिवार्य गुण

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

साहस और प्रेम ही अनिवार्य गुण हैं ; और सब गुण यदि धुँधले या निस्तेज पड़ जायें फिर भी ये दोनों आत्मा को जीवित रखेंगे।

साहस का अर्थ है भय के सभी रूपों की पूर्ण अनुपस्थिति।

संदर्भ : विचार और सूत्र के प्रसंग में