परम ज्योति

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ अपने कक्ष में

पूर्ण अचेतनता नाम की कोई चीज़ नहीं है – नितान्त अज्ञान जैसी, निपट रात जैसी कोई चीज़ नहीं। समस्त अवचेतनता के पीछे, समस्त अज्ञान के पीछे , रात्रि के पीछे सर्वदा ही परम ‘ज्योति’ विध्यमान है जो सर्वत्र है। अत्यंत छोटी – सी चीज़ भी सम्पर्क स्थापित करने का प्रारम्भ करने के लिए पर्याप्त है ।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१७)

पक्का विश्वास

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ का दर्शन

. . . तुम्हें कभी हताश नहीं होना चाहिये । या अगर तुम बहुत बार भूल कर चुके हो तो भी तुम्हें कभी भूल न करने की इच्छा रखनी चाहिये ; और तुम्हें इस बात का पक्का विश्वास होना चाहिये कि अगर तुम अपने संकल्प पर डटे रहो, तो एक-न-एक दिन तुम कठिनाई पर विजय प्राप्त कर लोगे।

 संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

यहाँ रहना आसान नहीं हैं

श्रीमाँ की अलौकिक कहानी

बाहरी रंग-रूप से निर्णय न करो और लोग जो कहते हैं उस पर विश्वास न करो, क्योंकि ये दोनों चीज़ें भटकाने वाली हैं। लेकिन अगर तुम्हें जाना ज़रूरी मालूम होता है, तो निस्सन्देह तुम जा सकते हो और बाहरी दृष्टिकोण से शायद यह अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण भी होगा।

और फिर, यहाँ रहना आसान नहीं है। आश्रम में कोई बाहरी अनुशासन या दिखायी देने वाली परीक्षा नहीं हैं। लेकिन आंतरिक परीक्षा निरन्तर और कठोर होती है। यहाँ रहने – लायक होने के लिए तुम्हें अपनी अभीप्सा  में बहुत सच्चा होना चाहिये ताकि तुम समस्त अहंकार को पार कर सको और मिथ्याभिमान को जीत सको।

पूर्ण समर्पण की बाहर से माँग नहीं की जाती, लेकिन जो लोग यहाँ बने रहना चाहते हैं उनके लिए यह अनिवार्य है और बहुत-सी चीज़ें समर्पण की सच्चाई की परीक्षा करने के लिए आती हैं। फिर भी, जो उनके लिए अभीप्सा हैं उनके लिए ‘कृपा’ और सहायता हमेशा मौजूद रहती हैं और उन्हें श्रद्धा-विश्वास के साथ ग्रहण किया जाये तो उनकी शक्ति असीम होती है।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

सबल और स्वस्थ शरीर

श्री अरविंद आश्रम की श्री माँ टेनिस का खेल

यह न भूलो कि हमारे योग में सफल होने के लिए तुम्हारे पास सबल ओर स्वस्थ शरीर होना चाहिये ।

इसके लिए, शरीर को व्यायाम करना चाहिये, तुम्हारा जीवन सक्रिय ओर नियमित होना चाहिये, तुम्हें शारीरिक काम करना चाहिये, अच्छी तरह खाना और सोना चाहिये ।

अच्छे स्वास्थ्य में ही रूपान्तर की ओर जाने का मार्ग मिलता है ।


सन्दर्भ : माताजी के वचन ( भाग – ३ )

समग्र दृष्टि 

श्री अरविंद आश्रम की श्री माँ

​हर एक के अपने विचार होते हैं और वह श्रीअरविन्द के लेखों में सें अपने विचारों का समर्थन करने वाले वाक्य खोज निकालता है । जो लोग इन विचारों का विरोध करते हैं वे भी उनके लेखों के अनुकूल वाक्य पा सकते हैं । पारस्परिक विरोध इसी तरह काम करता है । जब तक वस्तुओं के बारे में श्रीअरविन्द की समग्र दृष्टि को न लिया जाये तब तक सचमुच कुछ नहीं किया जा सकता ।

सन्दर्भ : माताजी के वचन (भाग – १)

सोने का सही तरीका 

श्री माँ अपने कक्ष में

सोने से पहले, जब तुम सोने के लिए लेटो, तो भौतिक रूप से अपने-आपको शिथिल करना शुरू करो (मैं इसे कहती हूं बिस्तर पर त्ता बन जाना) ।

फिर अपनी भरसक सचाई के साथ, अपने- आपको, पूर्ण शिथिलता में भगवान् के हाथों में समर्पित कर दो, और… बस इतना ही ।

जब तक तुम सफल न हो जाओ कोशिश करते रहो और फिर तुम देखोगे ।


सन्दर्भ : माताजी के वचन ( भाग – ३ )