तुम्हारा समय बीत गया

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

तुम इस समय यहाँ, यानी, धरती पर इसलिए हो क्योंकि एक समय तुमने यह चुनाव किया था – अब तुम्हें इसकी याद नहीं है, पर मैं जानती हूँ – इसी कारण तुम यहाँ हो। हाँ, तुम्हें इस कार्य की ऊँचाई तक उठना चाहिये, तुम्हें प्रयास करना चाहिये , तुम्हें सभी कमज़ोरियों और सीमाओं को जीतना चाहिये : और सबसे बढ़ कर तुम्हें अपने अहंकार से कहना चाहिये : “तुम्हारा समय बीत गया।” हम एक ऐसी जाति चाहते हैं जिसमें अहंकार न हो, जिसमें अहंकार की जगह भागवत चेतना हो। हम यही चाहते है : एक भागवत चेतना जो जाती को विकसित होने और अतिमानस सत्ता को जन्म लेने दे।

संदर्भ : पथ पर 

सबल और स्वस्थ शरीर

श्री अरविंद आश्रम की श्री माँ टेनिस का खेल

यह न भूलो कि हमारे योग में सफल होने के लिए तुम्हारे पास सबल ओर स्वस्थ शरीर होना चाहिये ।

इसके लिए, शरीर को व्यायाम करना चाहिये, तुम्हारा जीवन सक्रिय ओर नियमित होना चाहिये, तुम्हें शारीरिक काम करना चाहिये, अच्छी तरह खाना और सोना चाहिये ।

अच्छे स्वास्थ्य में ही रूपान्तर की ओर जाने का मार्ग मिलता है ।


सन्दर्भ : माताजी के वचन ( भाग – ३ )

भारत माता के योग्य शिशु

भारत माँ के लिये हम सबका दायित्व , श्री अरविंद आश्रम श्री माँ का संदेश

अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो । अपने कर्तव्यों को सच्चाई और ईमानदारी के साथ पूरा करो और ‘ भागवत कृपा ‘ में अडिग विश्वास रखते हुए हमेशा प्रफुल्ल और विश्वासपूर्ण बने रहो ।

सन्दर्भ : माताजी के वचन (भाग – १)

सोने का सही तरीका 

श्री माँ अपने कक्ष में

सोने से पहले, जब तुम सोने के लिए लेटो, तो भौतिक रूप से अपने-आपको शिथिल करना शुरू करो (मैं इसे कहती हूं बिस्तर पर त्ता बन जाना) ।

फिर अपनी भरसक सचाई के साथ, अपने- आपको, पूर्ण शिथिलता में भगवान् के हाथों में समर्पित कर दो, और… बस इतना ही ।

जब तक तुम सफल न हो जाओ कोशिश करते रहो और फिर तुम देखोगे ।


सन्दर्भ : माताजी के वचन ( भाग – ३ )

श्रद्धा और समर्पण

श्री अरविंद आश्रम की श्री माँ का चित्र

तुम्हारी श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण जितने अधिक संपूर्ण होंगे उतना ही अधिक तुम कृपापात्र और सुरक्षित होओगे ! और यदि मां भगवती की कृपा और रक्षक हाथ तुम पर हों तो ऐसा क्या है जो तुम्हें स्पर्श कर सके या जिसका तुम्हें भय हो? उसका अल्पांश भी तुम्हें सकल कठिनाइयों, बाधाओं और संकटों के पार कर देगा; उससे पूरे घिरे रहने पर तो, चूंकि वह पथ मां का ही है, तुम अपने पथ पर निरापद चल सकते हो तब तुम्हें किसी संकट की चिंता नहीं, तुम्हें कोई भी वैरता छू नहीं सकती वह चाहे कितनी ही सबल क्यों न हो, इस जगत् की हो या अदृश्य जगत् की । उसका स्पर्श कठिनाई को सुयोग में, विफलता को सफलता में और दुर्बलता को अडिग बल में बदल दे सकता है । कारण, मां भगवती को अनुकंपा परमेश्वर की अनुमति है और आज या कल उसका फल निश्चित है, पूर्व निर्दिष्ट, । अवश्यंभावी और अनिवार्य है !

सन्दर्भ : माताजी के विषय में 

श्री माँ के श्री चरण

The Mother's Divine Feet

मेज़ पर बैठी लिख रही हूं । बिलकुल सामने माँ के श्रीचरण हैं । देखते -देखते मन अपार्थिव आनंद से भर उठा। याद आया – किस तरह माँ के श्रीचरण प्राप्त हुए थे । प्रतिवर्ष जन्मदिन मनाने से पहले श्री माँ पूछती थी, “क्या चाहिये?” आश्चर्य की बात है ठीक उसी समय कोई इच्छा नहीं रहती थी । किसी तरह से कुछ भी मन में नहीं आता था । सीढ़ी से नीचे आने पर मन में आता कि अगले जन्मदिन पर माँ के श्रीचरण की एक फोटो मांग लूँगी । किन्तु हर वर्ष वही पुनरावृत्ति होती – अर्थात उस समय सब भूल जाती ।

“क्या चाहिये” सुनने मात्र से ही सब विस्मृति के अटल में डूब जाता । क्यों ऐसा होता था, मैं नहीं जानती । ऐसा लगता था मेरी कुछ भी इच्छा या चाह नहीं है ।

सन १९७२ मेँ मैंने माँ के चरणों मेँ अंतिम बार प्रणाम किया । यथारीति प्रणाम करके, माँ से आशीर्वाद-पुष्प लेकर जब लौट रही थी तब अचानक चम्पकलाल जी ने मुझे आवाज़ लगायी, ” प्रीति ! माँ तुम्हें बुला रही है । ” मैं जल्दी से दरवाजे के पास से माँ के पास आयी । अभी मैं  बैठ ही रही थी कि चम्पकलाल जी ने माँ के हाथ मेँ एक रंगीन श्रीचरण की फोटो दी और माँ ने मधुर भाव से हँसते हुए वह फोटो मुझे दे दी ।

 

Divine feet of The Mother Sri Aurobindo Ashram

मैं तो हैरान रह गयी । आनंद से भर गयी । सोचने लगी – ऐसा भी संभव है क्या ? माँ ने आज मेरी इतने वर्षों की आकांशा पूरी कर दी !! माँ को पुनः प्रणाम किया , मन ही मन बोली –

“निरखा, प्राण निछावर हो गये

चेरी भई श्रीचरण की ।”

 

धीर, शांत भाव से लौट आयी । सीढ़ी से नीचे उतरते – उतरते मन मेँ रही थी – कैसा आश्चर्य ! इतने वर्षों की मेरी आकांशा आज कैसे पूर्ण हुई ! कृतज्ञता से मन का कोना – कोना भर उठा ।

जहां (नीचे) अब माँ की शैया है, वहाँ काफी देर तक चुपचाप बैठी रही । तब मैं क्या जानती थी कि एक वर्ष के बाद इसी स्थान पर माँ का शरीर ऊपर से लाकर रखा जायेगा, और माँ के पास यह मेरा अंतिम जाना हुआ है । शायद इसी कारण माँ ने श्रीचरण देकर मेरी इतने दिनों की अभिलाषा पूर्ण की ।

 

संदर्भ : अविस्मरणीय वे क्षण ( प्रीति दास गुप्ता )

योग मार्ग

पहाड़ी रास्ता हमेशा दो दिशाओं में जाता है । ऊपर की ओर और नीचे की ओर-सब कुछ इस पर निर्भर है कि तुम किस ओर मुंह करते हो ।


जीवन सत्य और मिथ्यात्व के बीच, प्रकाश और अंधकार प्रगति और अवनति, ऊंचाइयों की ओर आरोहण या रसातल में पतन के बीच निरंतर चुनाव है । हर एक आजादी से चुन सकता है ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग – २)

भगवान तुम्हारे साथ हैं

Divine Mother of Sri Aurobindo Ashram Pondicherry

यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी सहायता और तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहे हैं । ‘वे’ ऐसे साथी हैं जो कभी धोखा नहीं देते ऐसे मित्र हैं जिनका प्रेम दिलासा देता और बल देता है । श्रद्धा रखो और वे तुम्हारे लिए सब कुछ कर देंगे ।


यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी सहायता और तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहे हैं । ‘वे’ ऐसे साथी हैं जो कभी धोखा नहीं देते, ऐसे मित्र हैं जिनका प्रेम दिलासा देता और बल देता है । जितना अधिक तुम अकेलापन अनुभव करोगे उतना ही अधिक तुम उसकी ज्योतिर्मयी ‘उपस्थिति’ को महसूस कर सकने के लिए तैयार होगे । श्रद्धा रखो और वे तुम्हारे लिए सब कुछ कर देंगे ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग -२)