मधुर माँ,
हम दूसरे की आवश्यकता को कैसे जान सकते और उसकी सहायता कैसे कर सकते हैं ?
मैं बाहरी चीजों और मानसिक क्षमताओं की बात नहीं कर रही थी ! सच्चा प्रेम अन्तरात्मा में होता है (बाकी सब प्राणिक आकर्षण या मानसिक अथवा भौतिक आसक्ति के सिवा कुछ नहीं है ) और अंतरात्मा या चैत्य पुरुष सहज वृत्ति से जानता है कि दुसरें को क्या पाने की जरूरत है और हमेशा उसे वह देने के लिए तैयार रहता है ।
संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…