गौरी पिंटो एक बहुत कोमल बालिका थी, श्रीमाँ ने प्रेमपूर्वक उसे नित्य अपने पास आने की अनुमति दी थी । जिन साधकों को यह विशेष कृपा प्रदान की जाती थी वे आश्रम के ध्यान कक्ष की सीढ़ियों पर बैठ जाते थे। गौरी को स्मरण था कि श्रीमाँ उन दिनों साड़ी और सोने की पायजेब पहनती थी। नन्ही गौरी श्रीमाँ की पायजेब देखने को हमेशा उत्सुक रहती थी। कभी कभी वे श्रीमाँ की साड़ी का किनारा उठा कर उनकी पायजेबें देख लेती थी ।
श्रीमाँ को यह ज्ञात था कि गौरी को नन्ही-नहीं वस्तुओं से प्यार था, अतः वे अपने पास चम्पा, जिसे उन्होने मनोवैज्ञानिक पूर्णता (साइक्लाजिकल परफ़ैक्श्नन ) नाम दिया है, के छोटे-छोटे फूल एक प्याले में रख लेती थीं और जब गौरी आती थी तब उसे एक या दो फूल देकर फ्रेंच भाषा में पूछती, “कितने?”
फिर कुछ और फूल देकर पूछती, “अब कितने हुए?” इस प्रकार भगवती माँ ने उस बच्ची को जोड़ सीखा दिया।
(यह कहानी मुझे सुश्री गौरी पिंटो ने सुनायी थी । )
संदर्भ : श्रीअरविंद और श्रीमाँ की दिव्य लीला
तुम्हें जो चीज़ जाननी चाहिये वह है, ठीक तरह से यह जानना कि तुम जीवन…
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…