अपने समस्त ह्रदय और समस्त शक्ति के साथ स्वयं को भगवान के हाथों में सौंप दो। कोई शर्त न रखो, कोई माँग नहीं, योग में सिद्धि भी नहीं, बिलकुल कुछ न चाहो, सिवा इसके कि तुम्हारें अंदर और सीधे तुम्हारे माध्यम से उनका संकल्प चरितार्थ हो। जो लोग भगवान से कुछ माँगते है, भगवान उन्हें वह चीज़ अवश्य देते हैं। किंतु जो लोग कुछ नहीं माँगते और अपने-आपको समर्पित कर देते हैं, उन्हें वे हर वह चीज़ दे देते ही जो वे मांग सकते थे या जिसकी उन्हें ज़रूरत हो सकती थी। इसके अतिरिक्त वे उन्हें अपने-आपको दे देते हैं और अपने प्रेम के सहज वरदान से सम्पन्न कर देते हैं ।
संदर्भ : श्रीअरविंद (खण्ड -१६)
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…