मैं तुम सबमें द्वार खोलने के लिए पूरा ध्यान देती हूँ, ताकि अगर तुम्हारें अंदर एकाग्रता की जरा भी गति हो, तो तुम्हें ऐसे बंद दरवाजे के सामने लंबी अवधियों तक न ठहरना पड़ें जो हिलता तक नहीं, जिसकी चाबी तुम्हारें पास नहीं है और जिसे तुम खोलना नहीं जानते।
दरवाजा खुला हुआ है, तुम्हें उस दिशा में देखना-भर होगा। तुम्हें उसकी और पीठ न करनी चाहिये।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…