एकमात्र चीज़ जो महत्वपूर्ण हैं, एकमात्र चीज़ जिसका मूल्य है, वह है ‘तेरे’ साथ आधिकाधिक पूरी तरह से तदात्म होने की इच्छा, हमारी चेतना को ‘तेरी’ निरपेक्ष चेतना के साथ युक्त करने की, ‘तेरे’ परम विधान, ‘तेरी’ प्रेममयी इच्छा का आधिकाधिक शांत, अचंचल, निस्स्वार्थ, बलवान सेवक बनने की इच्छा।
… मौन भक्ति से मैं तुझे नमन करती हूँ … ।
संदर्भ : प्रार्थना और ध्यान
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