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अहंकार का खेल

अहंकार के खेल के बिना कोई संघर्ष न होंगे और अगर प्राण में नाटक करने की वृत्ति न हो तो जीवन में नाटकीय घटनाएँ न होंगी।

हम भागवत मुस्कान का ध्यान तभी कर सकते हैं जब हम अहंकार पर विजय पा ले।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

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