सभी प्रकार की आसक्ति साधना में बाधक होती है । सबके कल्याण की कामना, सब के लिए अंतरात्मा की दया का होना तो ठीक है, पर किसी प्रकार की प्राणगत आसक्ति नहीं होनी चाहिये।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…