यह सम्पूर्ण प्रकृति इक मूक भाव से
केवल मात्र उसी को पुकारती है,
कि तपकते पीड़ाकूल जीवन के व्रण
उसके चरण-स्पर्श से भर-भर जाएं,
औ’ धूमिल अंतरात्मा पर अंकित
मुहर बंदियां टूट-फूट झर जाएं,
औ’ द्रव्यों के पीड़ित पड़े हृदय में
उसका आलोक प्रज्वलित हो जाये।
सावित्री पर्व ३ सर्ग २
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…